सुख-दुख में साथ-साथ



वे शहर में रहते थे. कभी-कभी कुछ दिनों के लिए गांव आते थे. अबकी बार बहुत दिनों बाद लौटे थे. उन्हें जब कक्का मिले, तो कहने लगे कि लगता ही नहीं है कि अपने ही गांव लौटा हूं, जहां चलने के लिए सड़कें नहीं थीं. जो शाम होते ही अंधेरे में डूब जाया करता था. वे हाल के वर्षों में गांव में आयी सुविधाओं के गुण गा रहे थे. साथ ही यह भी कह रहे थे कि अब यहां भी वो बात नहीं रही. लोगों को लोगों के लिए फुरसत नहीं है. जैसा शहर में होता है, सब अपने काम में मशगूल रहते हैं और सिर्फ अपने काम से काम रखते हैं. अब यहां भी वही नजारा दिख रहा है.


अनर्गल बात पर कक्का पिनक जाते हैं. उन पर बरस पड़े. कहने लगे कि पांच साल बाद शहर से लौटे हैं. अभी दो दिन भी नहीं हुआ आपको यहां आये और आप समझ गये कि यहां का आदमी भी मतलबी हो गया है. फिर थोड़ा नरम पड़े और समझाने लगे कि अभी लोगों के पास समय नहीं है.

 लोग सवेरे के निकले शाम तक खेतों में ही लगे रहते हैं. धान की तैयारी के साथ-साथ गेहूं, राजमा और मक्के की बुवाई का काम एक साथ सिर पर है. लोग जी जान से लगे हुए हैं कि सब समय पर हो जाए, तो चैन मिले. इसलिए आपको लोग एक जगह हंसते-बतियाते नहीं दिख रहे हैं. एक बार सब हो जाए, तो फिर क्या भोर, क्या दोपहर, क्या शाम, दो-चार लोग आपको यहां-वहां बतियाते दिख ही जायेंगे.


जब शहरी बाबू को समझ आ गया कि यह खेती का समय है, तो उन्होंने कक्का से क्षमा भी मांगी. उन्हें इस बात का अफसोस भी हुआ कि अब इसका भी स्मरण नहीं रह गया है कि हिंदी का कौन सा महीना चल रहा है और खेतों में क्या लगा हुआ है. उन्होंने बताया कि शहर में एक तो पांच लोगों को इकठ्ठा होने का कभी मौका नहीं मिलता. अगर संयोग से कभी मिल भी जाता है, तो दस मिनट में से पांच-सात मिनट का समय फोन पर बात करने में ही खत्म हो जाता है. इस पर कक्का हंस पड़े. बोले कि काम में मशगूल रहना अच्छी बात है. पर मिलने-जुलने से दुख-सुख का पता चलता है. किसी से मिलकर जब हम अपना दुख रखते हैं, तो उसका भार अपने आप कुछ कम हो जाता है और जब सुख रखते हैं, तो वह फैल कर बड़ा हो जाता है.


कक्काने शहरी बाबू को बताया कि अब भी गांव में कभी किसी के साथ कुछ अच्छा या बुरा होता है, तो पलक झपकते पूरे गांव को पता चल जाता है. दुख की घड़ी में कोई अपने को अकेला नहीं पाता, न ही सुख के क्षण को छुपा के रख पाता है. कक्का सही कह रहे थे. यहां के लोग अपनी कुछ संस्कृति को अब भी सुरक्षित रखे हुए हैं, जिन से कल तक रार ठनी हुई थी, दुख की घड़ी में वे भी घाव पर मरहम लगाने पहुंच जाते हैं और जब खुशी के क्षण आते हैं, हाथ पकड़ कर उनको भी इसमें शामिल किया जाता है. गांव में रार उनने के सैकड़ों मामूली कारण होते हैं. लेकिन कोई भी रार लंबा नहीं खींच पाता. कोई भी शुभ अवसर हो, उसमें बुलाकर खाना खिलाकर फिर से मेल-मिलाप कर लिया जाता है..

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