कुछ दिन पहले तक सोच रहे थे कि कोरोना तो बस गया . एक साल की जेल से जैसे निजात मिली. लेकिन जो सोचो, वह होता कहां है. होता तो कोरोना पिछले साल से अधिक तेजी से वापस आकर न डराता. हालांकि यह भी तो सच है कि बुरा वक्त बहुत सी अच्छी बातें भी सिखाता है.अब तक जैसा जीवन जीते आये हैं, उसमें बदलाव हो जाता है. तभी तो डिब्बाबंद खाने के मुकाबले इस दैर में घर के खाने की जरूरत अधिक महसूस हुई.
दशकों से डिब्बाबंद खाने को खाने, स्वाद, मां के हाथ जैसा खाना और सर्वोपरि अपनी हैसियत से जोड़ा गया था, लेकिन कोरोना ने इन सारी परिभाषाओं को दे पटका. पहले जिन घरों में महीने में एक-आध बार खाना बनता था, डिब्बाबंद खाने को ही प्राथमिकता दी जाती थी, वहां अब रोज खाना बनने लगा. महिलाएँ और पुरुष तरह-तरह के व्यंजन बनाकर फेसबुक पर उसकी तस्वीरें लगाने लगे.
घर के खाने के महत्व को बताया जाने लगा कि किस तरह यह साफ-सफाई से बनता है. पौष्टिक होता है. इसमें बनाने वाले के इंमोशंस जुड़े होते हैं और पुरानी कहावत सच होती है कि अगर अच्छे मन से भोजन बनाया जाये, तभी वह शरीर को लगता है.
यही नहीं, जिस जंक फूड के बोरे में कब से कहा जा रह था कि इसकी बढ़ती लोकप्रियता के कारण लोग और विशेषकर बच्चे मोटे हो रहे हैं. उनमें पौष्टिकता की कमी हो रही है. जंक फूड को कैसे रोका जाये. इसके लिए विभिन्न स्तरों पर तरह-तरह के प्रयास भी किये जते रहे हैं. जैसे कि बच्चों को इससे बचाने के लिए स्कूल कैंटींस में इसका न मिलना. स्कूल के आसपास ऐसी दुकानों का ना होना. ऐसे विज्ञापनों पर रोक की मांग करना जो बेहद आकर्षक ढंग से बनाये जाते हैं और इन्हें देखकर बच्चे ही नहीं, बड़े भी खाने के लिए लालायित हो उठते हैं.
लेकिन कोरोना के कारण इस तरह के खाद्य पदार्थों की तरफ लोगों की रुचि कम हो गयी है. लोग अब बाहर नहीं खा रहे हैं. वे अब पार्टियों या समारोहों में भी खाना पसंद नहीं करते हैं. 25 प्रतिशत लोग घर का खाना ही खा रहे हैं. सर्वे में शामिल कुल लोगों में से लगभग 43 प्रतिशत ने जंक फूड से तौबा कर ली है.
लोगों के स्वास्थ्य की नजर से देखा जाये, तो यह बहुत अच्छा हुआ है. समय-समय पर डॉक्टर बताते रहे हैं कि जंक फूड में स्वाद को बढ़ाने के लिए अधिक मात्रा में नमक, चीनी और चिकनाई का प्रयोग किया जाता है. जो स्वास्थ्य के लिए हनिकारक है. कई बार तो लोग स्वाद के चक्कर में एक बार में 8000 calories तक खाते देखे गये हैं. अक्सर ऐसे भोजन में पौष्टिकता का अभाव होता है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञ अक्सर ऐसे खाने के प्रति चेताते रहे हैं, मगर स्वाद के सामने स्वास्थ्य की चिंता प्रावः नहीं की जाती. सोचा जाता है कि जब सब खा रहे हैं, तो हम भी क्यों न खायें. कब तक डरते रहें कि कुछ हो जायेगा. जब होगा तब देखा जायेगा. लेकिन एक कोरोना ने पूरे सोच को बदल दिया है. सबसे दिलचस्प तथ्य ऑल इंडिया मेडिकल के सर्वे में पता चला.


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