कभी हम भी बच्चे थे, हमारा भी बचपन था. आज हमारे बच्चे हैं और उनका बचपन है.संसार का सृष्टि-चक्र ऐसे ही चलता है. हमें आंखें मिली हैं देखने के लिए, मस्तिष्क है सोचने-समझने और विचार करने के लिए, हम क्या करते हैं ? हस्तक्षेप करते हैं, बाधाएं पैदा करते हैं और उस ईश्वरीय व्यवस्था के प्रति विश्वास नहीं करते. ईश्वर तो कण-कण में है. इस तरह सोचने-विचारने और स्वीकार कर लेने से जीवन जीना सरल तो होता ही है, अलग तरह की सुरक्षा, शांति और आनंद की अनुभूति होती है.
छोटे बच्चों की अपनी दुनिया, अपनी सोच होती है. वे अपने आप में खेलते हैं, मगन और खुश रहते हैं. आप अपने बच्चे को पार्क में, झील, नदी या किसी जलाशय के पास ले जाइये, अपने पूजा-स्थलों पर जाइये , बिना उपदेश के ही बच्चे बहुत कुछ सीखेंगे. हमें अपना व अपने बच्चों के बौद्धिक विकास की चिंता करनी चाहिए, हम करते भी हैं. एक बार नीम करोली बाबा प्रयागराज में अचानक अपने एक भक्त के घर पहुंच गये. कहा, " बच्चे बने-बनाये पैकेज की तरह होते हैं, उन्हें मारने-पीटने की जरूरत नहीं है." महर्षि अरविंद के पिता डॉक्टर थे. अंग्रेज़ अधिकारियों के रहन-सहन से बहुत प्रभावित थे और चाहते थे कि उनके बच्चे बिल्कुल अंग्रेज की तरह बनें. उन्होंने सात वर्ष के अरविंद को इंग्लैंड भेज दिया. किसी अंग्रेज के घर में रखा और सख्त हिदायत थी कि वे किसी भी भारतीय के संपर्क में न आने पायें. पुत्र विछोह से अरविंद की मां विक्षिप्त हुई और उनका निधन हो गया. अरविंद जब वापस लौटे, तो विशुद्ध भारतीय बनकर. भारत भूमि पर चरण रखने के पूर्व उन्होंने अंग्रेजी लिबास त्याग दिया और भारतीय वस्त्र धोती-कुर्ता पहन लिया. चीन के बहुत बड़े चिंतक, साहित्यकार लुशून जब छोटे थे, तो पिता के लिए वैद्य के यहाँ से दवा की पुड़िया ले आते थे. पिता गुजर गये. लुशून के बाल-मन में यह बात बैठ गयी कि पिता का सही इलाज नहीं हुआ. मेडिकल की पढ़ाई के लिए जापान गये. वहां एक फिल्म देखी जिसमें दुबले-पतले जापानी सैनिक मोटे-ताजे चीनियों को पीट रहे थे. लुशून ने सोचा कि इन्हीं लेगों की शरीर रक्षा के लिए जीवन लगाऊंगा. उन्होंने जापान के प्रबुद्ध, सहित्यिक लोगों के बीच अपनी चिंता जाहिर की, तो उन्होंने कहा कि मनुष्य के बौद्धिक विकास के लिए साहित्य सबसे आवश्यक है. उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी व चीन वापस आ गये. चीन के पुनर्निर्माण के लिए विपुल साहित्य लिखा.
रवींद्रनाथ टैगोर के शॉति निकेतन का उद्देश्य ऐसा ही कुछ रहा है. हमारी प्राचीन शिक्षण व्यवस्था को गुलामी के काल में ध्वस्त कर जो शिक्षा-व्यवस्था लागू की गयी उससे बौद्धिक और व्यक्तित्वविकास संभव नहीं है. हमें अपने बच्चों के लिए इस दिशा में चिंतन और प्रयास करना चाहिए, उनके व्यक्तित्व-विकास के लिए बेहतर प्रणाली की खोज करनी चाहिए, आप छोटे-छोटे बच्चों को सुनिए, वे बहुत कुछ कहते हैं, बहुत कुछ कहना चाहते हैं. हम सुनते नहीं. आप अपनी और बच्चे की सोच के बीच थोड़ा स्पेस रखिए, स्वयं को लचीला बनाइए.



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