मनुष्य का असली दोस्त

 



देशभर में कड़ाके की ठंड पड रही है दिल्ली के बॉडरों पर इतने जाड़े पाले में भी किसान डटे हुए है ऐसे में अकसर प्रेमचंद की कहानी-"पूस की रात" याद आती है। इसमें किसान का असली साथी एक देशी कुत्ता है। गांवों और कृषि जीवन में किसानों के असली साथी,मददगार कुत्ते रहे है। वे उनके खेतों,घरों की रखवाली से लेकर जानवरों के साथ जाने और उन्हें घर तक वापस लाने में मदद करते रहे हैं । प्रेमचंद की "कुत्ते की कहानी" और टॉलस्टॉय की कहानी "शेर और कुत्ता" भी बहुत मशहूर रही हैं। किस्से कहानियों में देसी कुत्तों का खूब जिक्र आता है । लेकिन अफसोस है कि शहरों में रहने वाले एक-दो पीढ़ी पहले के लोग अपने गावों के असली साथी और दोस्त को भूल गए हैं । देसी कुत्ते,उन्हें अपने दोस्त नहीं,दुश्मन लगते हैं । इन्हें देखकर शहरी लोगों अकसर सोचते हैं कि ये काट लेंगे । इसीलिए अक्सर शहरों में तो इन्हें मारने के अभियान चलते ही रहते हैं।जो बचते हैं,वे बेचारे भूख,हर मौसम की मार और मनुष्यों की हिंसा झलते,तरह तरह की दुर्घटनाओं का शिकार होते हुए जैसे-तैसे अपना समय काट लेते है।

आश्चर्यजनक रूप से शहरों में जो लोग कुत्ते पालते हैं वह देश ही नहीं विदेशी नस्ल के कुत्ते होते हैं देसी कुत्ते पालना उन्हें अपनी हैसियत के खिलाफ लगता है स्वर्गीय अभिनेता ओमपुरी ने जरूर एक देसी कुतिया पाली थी। इसी तरह ग्रेटर नोएडा में रहने वाली एक लड़की ने इन कुत्तों के लिए आश्रय स्थल बनाया है पिछलें दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने देसी कुत्तों पर ध्यान देने की बात कही थी । उनका कहना था कि एनडीआरएफ में कई देसी कुत्तों को शामिल किया गया है,जिन्होंने आपदा के समय बहुत अच्छा काम किया है । हालांकि अपने यहां पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों में विदेशी नस्ल के कुत्तों का ही बोलबाला रहा है लेकिन अब देसी कुत्तों को भी जगह मिलने लगी है एक और जहां एक विदेशी नस्ल के कुत्ते की कीमत 30 से ₹70000 तक होती है वही देसी कुत्तों पर कुछ खास खर्च नहीं करना पड़ता भारतीय पारिस्थितिक और बदलते मौसमों को भी झेलने के ये आदी होते हैं यानी नहीं,उनके खानपान पर भी अलग से कोई ध्यान नहीं देना पड़ता है इसके अलावा दुश्मन को पकड़ने,सूंघने विपरीत परिस्थितियों में काम करने की इनकी क्षमता अभूतपूर्व होती है

उत्तराखंड में विदेशी कुत्ता पुलिस बल में शामिल किया गया था इसका नाम ठेंगा रखा गया था इसने अपनी सीखने की क्षमता और कौशल से बड़े से बड़े विदेशी नस्ल के कुत्तों को पछाड़ दिया था । हाल ही में इंडो तिब्बत बॉर्डर फोर्स में 17 देसी कुत्तों को शामिल किया गया है इसका बाकायदा नामकरण संस्कार किया गया सभी के भारतीय नाम रखे गए हैं जैसे कि गलवान,दौलत,समोमा,चिपचैप,सुल्तान आदि । उम्मीद है कि अब अपने देसी कुत्तों के भी दिन बहुरेंगे|अभी तक जितनी उपेक्षा उन्होंने झेली है,वह दूर होगी । वैसे भी आपको महाभारत की वर्क कथा तो याद ही होगी जहां युधिष्ठिर का अंत तक साथ निभाने के लिए उनका कुत्ता ही बचा था ।

              - क्षमा शर्मा

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