मुझे अच्छे से याद है, मैं पहले अक्सर हंसा करता था. मुझे हंसना आता था, फिर मैं लंबे वक्त से हंसा क्यों नहीं ? मैंने हंसने की कोशिश की, लेकिन हंस नहीं पाया. फिर किसी ने बताया, किसी काम का लगातार अभ्यास नहीं करने से उस काम में मुश्किल आती है.
बस उसी समय ठान लिया कि मैं पुनः हंसना सीखूंगा. जब दोस्तों को मालूम हुआ कि मैं हंसना सीखना चाहता हूं, तो उन्होंने शुभकामनाएं दीं. घर के बड़ो ने आशीर्वाद दिया. कहा, 'दो पीढ़ी गुजर गयी, खानदान में कोई हंसा नहीं. अब यही आरजू है कि बस एक बार तुम्हें हंसता हुआ देख लें.'
कोई भी काम सीखने के लिए गुरु की शरण में जाना जरूरी है, जब से राजनीति में शिष्यों ने गुरुओं को पटकनी दी है, अधिकांश गुरु अंडरग्राउंड हो गये हैं. योग्य आदमी वेश बदल कर घूम रहे हैं कि कहीं कोई पहचान कर गुरु न बना ले. यह तो मेरे पिछले जन्म के पुण्य थे जो इस जन्म में एक गुरु मिल गये. गुरु जी ने बताया, 'हंसना एक विधा है जिसकी अनेक शैली है. एक भाषा है जिसका आकर्षक व्याकरण है.
एक औजार है जो अत्यंत उपयोगी है. एक हथियार है जिसकी तेज धार है. हंसना हंसी-खेल नहीं है. हंसने के लिए हंसने वाला मिजाज होना जरूरी है. हंसने वाली बात, हंसने जैसे हालात होना जरूरी है.' जहां एक ओर बहुत ज्यादा हंसने वाले हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे रुखे स्वभाव वाले भी हैं जिन्होंने न हंसने की कसम खायी है. मैं कामयाब आशिक की तरह मुस्कुराना और विकसित देश के नागरिक की तरह खिलखिलाना चाहता हूं।
गुरु जी ने बताया, हंसी की अनेक श्रेणियां होती हैं, मैंने आज के पहले नहीं जाना था कि हंसना इतना कठिन काम है. मैं तो इसे दल-बदल की तरह आसान समझता था, पर यह तो सृजन की तरह कठिन निकला. गुरु जी ने हंसने के पॉपुलर फ्लेवर सामने रखे- 'खुल कर हंसना, धीरे से हंसना, खिलखिला कर हंसना, ठहाके लगा कर हंसना, आवाज दबा कर हंसना, नजरें बचा कर हंसना, हंसी को छुपाना, छुप-छुप कर हंसना, गम छुपाने के लिए हंसना, हंसी उड़ाने के लिए हंसना, मन ही मन हंसना, रोते-रोते हंसना, किसी को खुश करने के लिए हंसना.
' गुरु जी ने पूछा 'बोलिए इसमें कौन सा आइटम चाहिए?' मैंने कहा- 'मैं होठों पर नन्ही-मुन्नी सी मुस्कान चाहता हूं जिसमें प्रेम का संदेश हो, सहयोग का पैगाम हो, अपनत्व की भावना हो. ऐसी मुस्कान जो नफा-नुकसान के गणित से दूर हो. मैं ऐसी हंसी नहीं चाहता जो सुनी न जा सके.'
गुरु जी ने कहा- यह हंसी की विलुप्त होती प्रजाति है. अब न ऐसे हृदय हैं, न ऐसे होंठ जो ऐसी मुस्कान के वाहक बन सकें. हंसने का यह प्रारूप अब चलन में नहीं है. हंसी के उत्पादन की जो कच्ची सामग्री है, उसमें से एक है अनुकूल वातावरण अभी वातावरण ऐसी निश्छल हंसी के अनुकूल नहीं है. ऊपरी तौर पर लगा कि प्यास जीत गयी, पानी हार गया. लेकिन अंदर एक भरोसा जन्मा है कि जल्द दुनिया देखेगी मुस्कुराता भारत.

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